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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 206"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 206

**चौ०** 
> प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी॥  
> कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेहु सीलु सुचि साँचा॥१॥

भावार्थ: तीर्थराज प्रयागमें रहनेवाले वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन ( संन्यासी ) सब बहुत ही आनन्दित हैं और दस-पाँच मिलकर आपसमें कहते हैं कि भरतजीका प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है॥ १ ॥

**चौ०** 
> सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए॥  
> दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे॥२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके सुन्दर गुणसमूहोंको सुनते हुए वे मुनिश्रेष्ठ भरद्वाजजीके पास आये। मुनिने भरतजीको दण्डवत्‌-प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मूर्तिमान् सौभाग्य समझा॥ २ ॥

**चौ०** 
> धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे॥  
> आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे॥३॥

भावार्थ: उन्होंने दौड़कर भरतजीको उठाकर हृदयसे लगा लिया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। मुनिने उन्हें आसन दिया। वे सिर नवाकर इस तरह बैठे मानो भागकर संकोचके घरमें घुस जाना चाहते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू॥  
> सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई॥४॥

भावार्थ: उनके मनमें यह बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे [ तो मैं क्या उत्तर दूँगा ]। भरतजीके शील और संकोचको देखकर ऋषि बोले—भरत! सुनो, हम सब खबर पा चुके हैं। विधाताके कर्तव्यपर कुछ वश नहीं चलता॥ ४॥

**दो०** 
> तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझि मातु करतूति।  
> तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति॥२०६॥

भावार्थ: माताकी करतूतको समझकर ( याद करके ) तुम हृदयमें ग्लानि मत करो। हे तात! कैकेयीका कोई दोष नहीं है, उसकी बुद्धि तो सरस्वती बिगाड़ गयी थी॥ २०६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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