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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 205"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 205

भरद्वाजद्वारा भरतका सत्कार

**चौ०** 
> जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही॥  
> सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥१॥

भावार्थ: स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझें और लोग मुझे गुरुद्रोही तथा स्वामिद्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा प्रेम आपकी कृपासे दिन-दिन बढ़ता ही रहे॥१॥

**चौ०** 
> जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ॥  
> चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥२॥

भावार्थ: मेघ चाहे जन्मभर चातककी सुधि भुला दे और जल माँगनेपर वह चाहे वज्र और पत्थर ( ओले ) ही गिरावे, पर चातककी रटन घटनेसे तो उसकी बात ही घट जायगी ( प्रतिष्ठा ही नष्ट हो जायगी )। उसकी तो प्रेम बढ़नेमें ही सब तरहसे भलाई है॥२॥

**चौ०** 
> कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें॥  
> भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी॥३॥

भावार्थ: जैसे तपानेसे सोनेपर आब ( चमक ) आ जाती है, वैसे ही प्रियतमके चरणोंमें प्रेमका नियम निबाहनेसे प्रेमी सेवकका गौरव बढ़ जाता है। भरतजीके वचन सुनकर बीच त्रिवेणीमेंसे सुन्दर मङ्गल देनेवाली कोमल वाणी हुई॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू॥  
> बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं॥४॥

भावार्थ: हे तात भरत! तुम सब प्रकारसे साधु हो। श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मनमें ग्लानि कर रहे हो। श्रीरामचन्द्रको तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है॥ ४॥

**दो०** 
> तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।  
> भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल॥२०५॥

भावार्थ: त्रिवेणीजीके अनुकूल वचन सुनकर भरतजीका शरीर पुलकित हो गया, हृदयमें हर्ष छा गया। भरतजी धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगे॥ २०५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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