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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 204"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 204

**चौ०** 
> झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें॥  
> भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू॥१॥

भावार्थ: उनके चरणोंमें छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमलकी कलीपर ओसकी बूँदें चमकती हों। भरतजी आज पैदल ही चलकर आये हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दुःखी हो गया॥१॥

**चौ०** 
> खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए॥  
> सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने॥२॥

भावार्थ: जब भरतजीने यह पता पा लिया कि सब लोग स्नान कर चुके, तब त्रिवेणीपर आकर उन्हें प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक [ गङ्गा-यमुनाके ] श्वेत और श्याम जलमें स्नान किया और दान देकर ब्राह्मणोंका सम्मान किया॥२॥

**चौ०** 
> देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे॥  
> सकल कामप्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥३॥

भावार्थ: श्याम और सफेद ( यमुनाजी और गङ्गाजीकी ) लहरोंको देखकर भरतजीका शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा—हे तीर्थराज! आप समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। आपका प्रभाव वेदोंमें प्रसिद्ध और संसारमें प्रकट है॥३॥

**चौ०** 
> मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू॥  
> अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी॥४॥

भावार्थ: मैं अपना धर्म ( न माँगनेका क्षत्रियधर्म ) त्यागकर आपसे भीख माँगता हूँ। आर्त्त मनुष्य कौन-सा कुकर्म नहीं करता ? ऐसा हृदयमें जानकर सुजान उत्तम दानी जगत्‌में माँगनेवालेकी वाणीको सफल किया करते हैं ( अर्थात्‌ वह जो माँगता है, सो दे देते हैं )॥४॥

**दो०** 
> अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।  
> जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन॥२०४॥

भावार्थ: मुझे न अर्थकी रुचि ( इच्छा ) है, न धर्मकी, न कामकी और न मैं मोक्ष ही चाहता हूँ। जन्म-जन्ममें मेरा श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो, बस, यही वरदान माँगता हूँ, दूसरा कुछ नहीं॥२०४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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