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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 201"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 201

**चौ०** 
> राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ॥  
> पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती॥१॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीने कानोंसे भी कभी दुःखका नाम नहीं सुना। महाराज स्वयं जीवन-वृक्षकी तरह उनकी सार-सँभाल किया करते थे। सब माताएँ भी रात-दिन उनकी ऐसी सार-सँभाल करती थीं, जैसे पलक नेत्रोंकी और साँप अपनी मणिकी करते हैं॥१॥

**चौ०** 
> ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी॥  
> धिग कैकई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला॥२॥

भावार्थ: वही श्रीरामचन्द्रजी अब जंगलोंमें पैदल फिरते हैं और कन्द-मूल तथा फल-फूलोंका भोजन करते हैं। अमङ्गलकी मूल कैकेयीको धिक्कार है, जो अपने प्राणप्रियतम पतिसे भी प्रतिकूल हो गयी॥२॥

**चौ०** 
> मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी॥  
> कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ॥३॥

भावार्थ: मुझ पापोंके समुद्र और अभागेको धिक्कार है, धिक्कार है, जिसके कारण ये सब उत्पात हुए। विधाताने मुझे कुलका कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाताने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया॥३॥

**चौ०** 
> सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू॥  
> राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि॥४॥

भावार्थ: यह सुनकर निषादराज प्रेमपूर्वक समझाने लगा—हे नाथ! आप व्यर्थ विषाद किस लिये करते हैं ? श्रीरामचन्द्रजी आपको प्यारे हैं और आप श्रीरामचन्द्रजीको प्यारे हैं। यही निचोड़ ( निश्चित सिद्धान्त ) है, दोष तो प्रतिकूल विधाताको है॥४॥

**छं०** 
> बिधि बाम की करनी कठिन जेहिं मातु कीन्ही बावरी।  
> तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी॥  
> तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौंहें किएँ।  
> परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ॥

भावार्थ: प्रतिकूल विधाताकी करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेयीको बावली बना दिया ( उसकी मति फेर दी )। उस रातको प्रभु श्रीरामचन्द्रजी बार-बार आदरपूर्वक आपकी बड़ी सराहना करते थे। तुलसीदासजी कहते हैं—[ निषादराज कहता है कि— ] श्रीरामचन्द्रजीको आपके समान अतिशय प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूँ। परिणाममें मङ्गल होगा, यह जानकर आप अपने हृदयमें धैर्य धारण कीजिये।

**सो०** 
> अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन।  
> चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन॥२०१॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्यामी तथा संकोच, प्रेम और कृपाके धाम हैं, यह विचारकर और मनमें दृढ़ता लाकर चलिये और विश्राम कीजिये॥२०१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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