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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 20"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 20

**चौ०** 
> कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी॥  
> तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी॥१॥

भावार्थ: कैकेयी मन्थराकी कड़वी वाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती। शरीरमें पसीना हो आया और वह केलेकी तरह काँपने लगी। तब कुबरी ( मन्थरा )-ने अपनी जीभ दाँतों-तले दबायी ( उसे भय हुआ कि कहीं भविष्यका अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयीके हृदयकी गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय )॥ १ ॥

**चौ०** 
> कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी॥  
> फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली॥२॥

भावार्थ: फिर कपटकी करोड़ों कहानियाँ कह-कहकर उसने रानीको खूब समझाया कि धीरज रखो! कैकेयीका भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी। वह बगुलीको हंसिनी मानकर ( वैरिनको हित मानकर ) उसकी सराहना करने लगी॥ २ ॥

**चौ०** 
> सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी॥  
> दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने॥३॥

भावार्थ: कैकेयीने कहा—मन्थरा! सुन, तेरी बात सत्य है। मेरी दाहिनी आँख नित्य फड़का करती है। मैं प्रतिदिन रातको बुरे स्वप्न देखती हूँ; किन्तु अपने अज्ञानवश तुझसे कहती नहीं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> काह करौं सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ॥४॥

भावार्थ: सखी! क्या करूँ, मेरा तो सीधा स्वभाव है। मैं दायाँ-बायाँ कुछ भी नहीं जानती॥ ४॥

**दो०** 
> अपनें चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।  
> केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह॥२०॥

भावार्थ: अपनी चलते ( जहाँतक मेरा वश चला ) मैंने आजतक कभी किसीका बुरा नहीं किया। फिर न जाने किस पापसे दैवने मुझे एक ही साथ यह दुःसह दुःख दिया॥ २० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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