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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 197"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 197

**चौ०** 
> सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब॥  
> सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू॥१॥

भावार्थ: भरतजीने जब शृङ्गवेरपुरको देखा, तब उनके सब अङ्ग प्रेमके कारण शिथिल हो गये। वे निषादको लाग दिये ( अर्थात्‌ उसके कंधेपर हाथ रखे चलते हुए ) ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो विनय और प्रेम शरीर धारण किये हुए हों॥ १ ॥

**चौ०** 
> एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा॥  
> रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू॥२॥

भावार्थ: इस प्रकार भरतजीने सब सेनाको साथमें लिये हुए जगत्‌को पवित्र करनेवाली गङ्गाजीके दर्शन किये। श्रीरामघाटको [ जहाँ श्रीरामजीने स्नान-सन्ध्या की थी ] प्रणाम किया। उनका मन इतना आनन्दमग्न हो गया, मानो उन्हें स्वयं श्रीरामजी मिल गये हों॥ २ ॥

**चौ०** 
> करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी॥  
> करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी॥३॥

भावार्थ: नगरके नर-नारी प्रणाम कर रहे हैं और गङ्गाजीके ब्रह्मरूप जलको देख-देखकर आनन्दित हो रहे हैं। गङ्गाजीमें स्नानकर हाथ जोड़कर सब यही वर माँगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें हमारा प्रेम कम न हो ( अर्थात्‌ बहुत अधिक हो )॥ ३ ॥

**चौ०** 
> भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू॥  
> जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू॥४॥

भावार्थ: भरतजीने कहा—हे गङ्गे! आपकी रज सबको सुख देनेवाली तथा सेवकके लिये तो कामधेनु ही है। मैं हाथ जोड़कर यही वरदान माँगता हूँ कि श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मेरा स्वाभाविक प्रेम हो॥ ४ ॥

**दो०** 
> एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।  
> मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ॥१९७॥

भावार्थ: इस प्रकार भरतजी स्नान कर और गुरुजीकी आज्ञा पाकर तथा यह जानकर कि सब माताएँ स्नान कर चुकी हैं, डेरा उठा ले चले॥ १९७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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