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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 195"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 195

**चौ०** 
> नहि अचिरिजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई॥  
> राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं॥१॥

भावार्थ: इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग-युगान्तरसे यही रीति चली आ रही है। श्रीरघुनाथजीने किसको बड़ाई नहीं दी ? इस प्रकार देवता रामनामकी महिमा कह रहे हैं और उसे सुन-सुनकर अयोध्याके लोग सुख पा रहे हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा॥  
> देखि भरत कर सीलु सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू॥२॥

भावार्थ: रामसखा निषादराजसे प्रेमके साथ मिलकर भरतजीने कुशल, मङ्गल और क्षेम पूछी। भरतजीका शील और प्रेम देखकर निषाद उस समय विदेह हो गया ( प्रेममुग्ध होकर देहकी सुध भूल गया )॥ २ ॥

**चौ०** 
> सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा॥  
> धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी॥३॥

भावार्थ: उसके मनमें संकोच, प्रेम और आनन्द इतना बढ़ गया कि वह खड़ा-खड़ा टकटकी लगाये भरतजीको देखता रहा। फिर धीरज धरकर भरतजीके चरणोंकी वन्दना करके प्रेमके साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा—॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी॥  
> अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें॥४॥

भावार्थ: हे प्रभो! कुशलके मूल आपके चरणकमलोंके दर्शन कर मैंने तीनों कालोंमें अपना कुशल जान लिया। अब आपके परम अनुग्रहसे करोड़ों कुलों ( पीढ़ियों )-सहित मेरा मङ्गल ( कल्याण ) हो गया॥ ४ ॥

**दो०** 
> समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।  
> जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ॥१९५॥

भावार्थ: मेरी करतूत और कुलको समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी महिमाको मनमें देख ( विचार ) कर ( अर्थात्‌ कहाँ तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करनेवाला जीव, और कहाँ अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी! पर उन्होंने मुझ-जैसे नीचको भी अपनी अहैतुकी कृपावश अपना लिया—यह समझकर ) जो रघुवीर श्रीरामजीके चरणोंका भजन नहीं करता, वह जगत्‌में विधाताके द्वारा ठगा गया है॥ १९५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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