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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 194"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 194

**चौ०** 
> भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती॥  
> धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला॥१॥

भावार्थ: भरतजी गुहको अत्यन्त प्रेमसे गले लगा रहे हैं। प्रेमकी रीतिको सब लोग सिहा रहे हैं ( ईर्ष्यापूर्वक प्रशंसा कर रहे हैं ), मङ्गलकी मूल ‘धन्य-धन्य’ की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा॥  
> तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता॥२॥

भावार्थ: [ वे कहते हैं— ] जो लोक और वेद दोनोंमें सब प्रकारसे नीचा माना जाता है, जिसकी छायाके छू जानेसे भी स्नान करना होता है, उसी निषादसे अँकवार भरकर ( हृदयसे चिपटाकर ) श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई भरतजी [ आनन्द और प्रेमवश ] शरीरमें पुलकावलीसे परिपूर्ण हो मिल रहे हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं॥  
> यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा॥३॥

भावार्थ: जो लोग राम-राम कहकर जँभाई लेते हैं ( अर्थात्‌ आलस्यसे भी जिनके मुँहसे रामनामका उच्चारण हो जाता है ), पापोंके समूह ( कोई भी पाप ) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुहको तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने हृदयसे लगा लिया और कुलसमेत इसे जगत्पावन ( जगत्‌को पवित्र करनेवाला ) बना दिया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई॥  
> उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना॥४॥

भावार्थ: कर्मनाशा नदीका जल गङ्गाजीमें पड़ जाता है ( मिल जाता है ), तब कहिये, उसे कौन सिरपर धारण नहीं करता ? जगत्‌ जानता है कि उलटा नाम ( मरा-मरा ) जपते-जपते वाल्मीकिजी ब्रह्मके समान हो गये॥ ४ ॥

**दो०** 
> स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।  
> रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात॥१९४॥

भावार्थ: मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी रामनाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवनमें विख्यात हो जाते हैं॥ १९४ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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