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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 191"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 191

**चौ०** 
> बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ॥  
> भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा॥१॥

भावार्थ: [ उसने कहा— ] हे भाइयो! जल्दी करो और सब सामान सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई मनमें कायरता न लावे। सब हर्षके साथ बोल उठे—हे नाथ! बहुत अच्छा; और आपसमें एक-दूसरेका जोश बढ़ाने लगे॥ १ ॥

**चौ०** 
> चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी॥  
> सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं॥२॥

भावार्थ: निषादराजको जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राममें लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंकी जूतियोंका स्मरण करके उन्होंने भाथियाँ ( छोटे-छोटे तरकस ) बाँधकर धनुहियों ( छोटे-छोटे धनुषों )-पर प्रत्यञ्चा चढ़ायीं॥ २ ॥

**चौ०** 
> अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं॥  
> एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहिं गगन मनहुँ छिति छाँड़े॥३॥

भावार्थ: कवच पहनकर सिरपर लोहेका टोप रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछोंको सीधा कर रहे हैं ( सुधार रहे हैं )। कोई तलवारके वार रोकनेमें अत्यन्त ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंगमें भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाशमें कूद ( उछल ) रहे हों॥ ३ ॥

**चौ०** 
> निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई॥  
> देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने॥४॥

भावार्थ: अपना-अपना साज-समाज ( लड़ाईका सामान और दल ) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुहको जोहार की। निषादराजने सुन्दर योद्धाओंको देखकर, सबको सुयोग्य जाना और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया॥ ४ ॥

**दो०** 
> भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।  
> सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि॥१९१॥

भावार्थ: [ उसने कहा— ] हे भाइयो! धोखा न लाना ( अर्थात्‌ मरनेसे न घबराना ),आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोशके साथ बोल उठे—हे वीर! अधीर मत हो॥ १९१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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