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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 189"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 189

निषादकी शङ्का और सावधानी

**चौ०** 
> सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने॥  
> समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा॥१॥

भावार्थ: रातभर सई नदीके तीरपर निवास करके सबेरे वहाँसे चल दिये और सब शृङ्गवेरपुरके समीप जा पहुँचे। निषादराजने सब समाचार सुने, तो वह दुखी होकर हृदयमें विचार करने लगा—॥ १ ॥

**चौ०** 
> कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं॥  
> जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई॥२॥

भावार्थ: क्या कारण है जो भरत वनको जा रहे हैं, मनमें कुछ कपट-भाव अवश्य है। यदि मनमें कुटिलता न होती, तो साथमें सेना क्यों ले चले हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी॥  
> भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी॥३॥

भावार्थ: समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामको मारकर सुखसे निष्कण्टक राज्य करूँगा। भरतने हृदयमें राजनीतिको स्थान नहीं दिया ( राजनीतिका विचार नहीं किया )। तब ( पहले ) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवनसे ही हाथ धोना पड़ेगा॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा॥  
> का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं॥४॥

भावार्थ: सम्पूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जायँ, तो भी श्रीरामजीको रणमें जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है? विषकी बेलें अमृतफल कभी नहीं फलतीं!॥ ४ ॥

**दो०** 
> अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।  
> हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु॥१८९॥

भावार्थ: ऐसा विचारकर गुह ( निषादराज ) ने अपनी जातिवालोंसे कहा कि सब लोग सावधान हो जाओ। नावोंको हाथमें ( कब्जेमें ) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटोंको रोक दो॥ १८९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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