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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 185"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 185

**चौ०** 
> भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा॥  
> चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के॥१॥

भावार्थ: सबके मनमें कम आनन्द नहीं हुआ ( अर्थात्‌ बहुत ही आनन्द हुआ )! मानो मेघोंकी गर्जना सुनकर चातक और मोर आनन्दित हो रहे हों। [ दूसरे दिन ] प्रातःकाल चलनेका सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभीको प्राणप्रिय हो गये॥ १ ॥

**चौ०** 
> मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई॥  
> धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं॥२॥

भावार्थ: मुनि वसिष्ठजीकी वन्दना करके और भरतजीको सिर नवाकर, सब लोग विदा लेकर अपने-अपने घरको चले। जगत्‌में भरतजीका जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील और स्नेहकी सराहना करते जाते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> कहहिं परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू॥  
> जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी॥३॥

भावार्थ: आपसमें कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलनेकी तैयारी करने लगे। जिसको भी घरकी रखवालीके लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वही समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी॥ ३ ॥

**चौ०** 
> कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू॥४॥

भावार्थ: कोई-कोई कहते हैं—रहनेके लिये किसीको भी मत कहो, जगत्‌में जीवनका लाभ कौन नहीं चाहता?॥ ४ ॥

**दो०** 
> जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृद मातु पितु भाइ।  
> सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ॥१८५॥

भावार्थ: वह सम्पत्ति, घर, सुख, मित्र, माता, पिता, भाई जल जाय जो श्रीरामजीके चरणोंके सम्मुख होनेमें हँसते हुए ( प्रसन्नतापूर्वक ) सहायता न करे॥ १८५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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