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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 183"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 183

**चौ०** 
> आन उपाउ मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा॥  
> एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं॥१॥

भावार्थ: मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्रीरामजीके बिना मेरे हृदयकी बात कौन जान सकता है ? मनमें एक ही आँक ( निश्चयपूर्वक ) यही है कि प्रातःकाल प्रभु श्रीरामजीके पास चल दूँगा॥ १ ॥

**चौ०** 
> जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी॥  
> तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी॥२॥

भावार्थ: यद्यपि मैं बुरा हूँ और अपराधी हूँ, और मेरे ही कारण यह सब उपद्रव हुआ है, तथापि श्रीरामजी मुझे शरणमें सम्मुख आया हुआ देखकर सब अपराध क्षमा करके मुझपर विशेष कृपा करेंगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ॥  
> अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा॥३॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजी शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और स्नेहके घर हैं। श्रीरामजीने कभी शत्रुका भी अनिष्ट नहीं किया। मैं यद्यपि टेढ़ा हूँ पर हूँ तो उनका बच्चा और गुलाम ही॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी॥  
> जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी॥४॥

भावार्थ: आप पंच ( सब ) लोग भी इसीमें मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणीसे आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानीको लौट आवें॥ ४॥

**दो०** 
> जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।  
> आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस॥१८३॥

भावार्थ: यद्यपि मेरा जन्म कुमातासे हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषयुक्त भी हूँ, तो भी मुझे श्रीरामजीका भरोसा है कि वे मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं॥ १८३ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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