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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 182"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 182

**चौ०** 
> गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना॥  
> मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ॥१॥

भावार्थ: गुरुजी ज्ञानके समुद्र हैं, इस बातको सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व हथेलीपर रखे हुए बेरके समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलकका साज सज रहे हैं। सत्य है, विधाताके विपरीत होनेपर सब कोई विपरीत हो जाते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं॥  
> सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी॥२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजी और सीताजीको छोड़कर जगत्‌में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थमें मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूँगा और सहूँगा। क्योंकि जहाँ पानी होता है, वहाँ अन्तमें कीचड़ होता ही है॥ २ ॥

**चौ०** 
> डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू॥  
> एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी॥३॥

भावार्थ: मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोकका ही सोच है। मेरे हृदयमें तो बस, एक ही दुःसह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दुखी हुए॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा॥  
> मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी॥४॥

भावार्थ: जीवनका उत्तम लाभ तो लक्ष्मणने पाया, जिन्होंने सब कुछ तजकर श्रीरामजीके चरणोंमें मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजीके वनवासके लिये ही हुआ था। मैं अभागा झूठ-मूठ क्या पछताता हूँ ?॥ ४॥

**दो०** 
> आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।  
> देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ॥१८२॥

भावार्थ: सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूँ। श्रीरघुनाथजीके चरणोंके दर्शन किये बिना मेरे जीकी जलन न जायगी॥ १८२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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