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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 179"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 179

**चौ०** 
> कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू॥  
> मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं॥१॥

भावार्थ: मैं सत्य कहता हूँ, आप सब सुनकर विश्वास करें, धर्मशीलको ही राजा होना चाहिये। आप मुझे हठ करके ज्यों ही राज्य देंगे त्यों ही पृथ्वी पातालमें धँस जायगी॥१॥

**चौ०** 
> मोहि समान को पापनिवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू॥  
> रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा॥२॥

भावार्थ: मेरे समान पापोंका घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्रीरामजीका वनवास हुआ? राजाने श्रीरामजीको वन दिया और उनके बिछुड़ते ही स्वयं स्वर्गको गमन किया॥२॥

**चौ०** 
> मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू॥  
> बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू॥३॥

भावार्थ: और मैं दुष्ट, जो सारे अनर्थोंका कारण हूँ, होश-हवासमें बैठा सब बातें सुन रहा हूँ! श्रीरघुनाथजीसे रहित घरको देखकर और जगत्‌का उपहास सहकर भी ये प्राण बने हुए हैं॥३॥

**चौ०** 
> राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे॥  
> कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई॥४॥

भावार्थ: [ इसका यही कारण है कि ये प्राण ] श्रीरामरूपी पवित्र विषय-रसमें आसक्त नहीं हैं। ये लालची भूमि और भोगोंके ही भूखे हैं। मैं अपने हृदयकी कठोरता कहाँतक कहूँ? जिसने वज्रका भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है॥४॥

**दो०** 
> कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहिं मोर।  
> कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर॥१७९॥

भावार्थ: कारणसे कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डीसे वज्र और पत्थरसे लोहा भयानक और कठोर होता है॥१७९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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