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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 177"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 177

**चौ०** 
> मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का॥  
> मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा॥१॥

भावार्थ: गुरुजीने मुझे सुन्दर उपदेश दिया। [ फिर ] प्रजा, मन्त्री आदि सभीको यही सम्मत है। माताने भी उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा ही करना चाहता हूँ॥१॥

**चौ०** 
> गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी॥  
> उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू॥२॥

भावार्थ: [ क्योंकि ] गुरु, पिता, माता, स्वामी और सुहृद्‌ ( मित्र ) की वाणी सुनकर प्रसन्न मनसे उसे अच्छी समझकर करना ( मानना ) चाहिये। उचित-अनुचितका विचार करनेसे धर्म जाता है और सिरपर पापका भार चढ़ता है॥२॥

**चौ०** 
> तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई॥  
> जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें॥३॥

भावार्थ: आप तो मुझे वही सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करनेमें मेरा भला हो। यद्यपि मैं इस बातको भलीभाँति समझता हूँ, तथापि मेरे हृदयको सन्तोष नहीं होता॥३॥

**चौ०** 
> अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू॥  
> ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू॥४॥

भावार्थ: अब आपलोग मेरी विनती सुन लीजिये और मेरी योग्यताके अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दे रहा हूँ, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दुखी मनुष्यके दोष-गुणोंको नहीं गिनते॥४॥

**दो०** 
> पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।  
> एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु॥१७७॥

भावार्थ: पिताजी स्वर्गमें हैं, श्रीसीतारामजी वनमें हैं और मुझे आप राज्य करनेके लिये कह रहे हैं। इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम [ होनेकी आशा रखते हैं ] ?॥१७७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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