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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 174"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 174

**चौ०** 
> सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी॥  
> यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू॥१॥

भावार्थ: राजा सब प्रकारसे बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो॥१॥

**चौ०** 
> रायँ राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा॥  
> तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी॥२॥

भावार्थ: राजाने राजपद तुमको दिया है। पिताका वचन तुम्हें सत्य करना चाहिये, जिन्होंने वचनके लिये ही श्रीरामचन्द्रजीको त्याग दिया और रामविरहकी अग्निमें अपने शरीरकी आहुति दे दी॥२॥

**चौ०** 
> नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना॥  
> करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई॥३॥

भावार्थ: राजाको वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात! पिताके वचनोंको प्रमाण ( सत्य ) करो! राजाकी आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसमें तुम्हारी सब तरह भलाई है॥३॥

**चौ०** 
> परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी॥  
> तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ॥४॥

भावार्थ: परशुरामजीने पिताकी आज्ञा रखी और माताको मार डाला; सब लोक इस बातके साक्षी हैं। राजा ययातिके पुत्रने पिताको अपनी जवानी दे दी। पिताकी आज्ञा पालन करनेसे उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ॥४॥

**दो०** 
> अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।  
> ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन॥१७४॥

भावार्थ: जो अनुचित और उचितका विचार छोड़कर पिताके वचनोंका पालन करते हैं, वे [ यहाँ ] सुख और सुयशके पात्र होकर अन्तमें इन्द्रपुरी ( स्वर्ग )-में निवास करते हैं॥१७४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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