---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 173"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-173"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 173

**चौ०** 
> बैखानस सोइ सोचै जोगू। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू॥  
> सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी॥१॥

भावार्थ: वानप्रस्थ वही सोच करनेयोग्य है जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई-बन्धुओंके साथ विरोध रखनेवाला है॥१॥

**चौ०** 
> सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी॥  
> सोचनीय सबहीं बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई॥२॥

भावार्थ: सब प्रकारसे उसका सोच करना चाहिये जो दूसरोंका अनिष्ट करता है, अपने ही शरीरका पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकारसे सोच करनेयोग्य है जो छल छोड़कर हरिका भक्त नहीं होता॥२॥

**चौ०** 
> सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥  
> भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा॥३॥

भावार्थ: कोसलराज दशरथजी सोच करनेयोग्य नहीं हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है। हे भरत! तुम्हारे पिता-जैसा राजा तो न हुआ, न है और न अब होनेका ही है॥३॥

**चौ०** 
> बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा॥४॥

भावार्थ: ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजीके गुणोंकी कथाएँ कहा करते हैं॥४॥

**दो०** 
> कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।  
> राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु॥१७३॥

भावार्थ: हे तात! कहो, उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा जिनके श्रीराम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न-सरीखे पवित्र पुत्र हैं?॥१७३॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-172  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-174

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
