---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 172"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-172"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 172

**चौ०** 
> अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू॥  
> तात बिचारु करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं॥१॥

भावार्थ: ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय? और व्यर्थ किसपर क्रोध किया जाय? हे तात! मनमें विचार करो। राजा दशरथ सोच करनेके योग्य नहीं हैं॥१॥

**चौ०** 
> सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना॥  
> सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना॥२॥

भावार्थ: सोच उस ब्राह्मणका करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय-भोगमें ही लीन रहता है। उस राजाका सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणोंके समान प्यारी नहीं है॥२॥

**चौ०** 
> सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू॥  
> सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी॥ ३ ॥

भावार्थ: उस वैश्यका सोच करना चाहिये जो धनवान्‌ होकर भी कंजूस है, और जो अतिथिसत्कार तथा शिवजीकी भक्ति करनेमें कुशल नहीं है। उस शूद्रका सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणोंका अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान-बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञानका घमंड रखनेवाला है॥३॥

**चौ०** 
> सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी॥  
> सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई॥४॥

भावार्थ: पुनः उस स्त्रीका सोच करना चाहिये जो पतिको छलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारीका सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रतको छोड़ देता है और गुरुकी आज्ञाके अनुसार नहीं चलता॥४॥

**दो०** 
> सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।  
> सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग॥१७२॥

भावार्थ: उस गृहस्थका सोच करना चाहिये जो मोहवश कर्ममार्गका त्याग कर देता है; उस संन्यासीका सोच करना चाहिये जो दुनियाके प्रपञ्चमें फँसा हुआ है और ज्ञान-वैराग्यसे हीन है॥१७२॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-171  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-173

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
