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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 171"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 171

**चौ०** 
> पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी॥  
> सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥१॥

भावार्थ: पिताजीके लिये भरतजीने जैसी करनी की वह लाखों मुखोंसे भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठजी आये और उन्होंने मन्त्रियों तथा सब महाजनोंको बुलवाया॥१॥

**चौ०** 
> बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई॥  
> भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे॥२॥

भावार्थ: सब लोग राजसभामें जाकर बैठ गये। तब मुनिने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयोंको बुलवा भेजा। भरतजीको वसिष्ठजीने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्मसे भरे हुए वचन कहे॥२॥

**चौ०** 
> प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी॥  
> भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा॥३॥

भावार्थ: पहले तो कैकेयीने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनिने वह सारी कथा कही। फिर राजाके धर्मव्रत और सत्यकी सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेमको निबाहा॥३॥

**चौ०** 
> कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ॥  
> बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी॥४॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके गुण, शील और स्वभावका वर्णन करते-करते तो मुनिराजके नेत्रोंमें जल भर आया और वे शरीरसे पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मणजी और सीताजीके प्रेमकी बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेहमें मग्न हो गये॥४॥

**दो०** 
> सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।  
> हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ॥१७१॥

भावार्थ: मुनिनाथने विलखकर ( दुखी होकर ) कहा—हे भरत! सुनो, भावी ( होनहार ) बड़ी बलवान्‌ है। हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाताके हाथ हैं॥१७१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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