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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 169"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 169

वसिष्ठ-भरत-संवाद, श्रीरामजीको लानेके लिये चित्रकूट जानेकी तैयारी

**चौ०** 
> राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे॥  
> बिधु बिष चवै स्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी॥१॥

भावार्थ: श्रीराम तुम्हारे प्राणोंसे भी बढ़कर प्राण ( प्रिय ) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथको प्राणोंसे भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जलसे विरक्त हो जाय,॥१॥

**चौ०** 
> भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥  
> मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं॥२॥

भावार्थ: और ज्ञान हो जानेपर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्रके प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत्‌में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्नमें भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे॥२॥

**चौ०** 
> अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्रवहिं नयन जल छाए॥  
> करत बिलाप बहुत एहि भाँती। बैठेहिं बीति गई सब राती॥३॥

भावार्थ: ऐसा कहकर माता कौसल्याने भरतजीको हृदयसे लगा लिया। उनके स्तनोंसे दूध बहने लगा और नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे-ही-बैठे बीत गयी॥३॥

**चौ०** 
> बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए॥  
> मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे॥४॥

भावार्थ: तब वामदेवजी और वसिष्ठजी आये। उन्होंने सब मन्त्रियों तथा महाजनोंको बुलवाया। फिर मुनि वसिष्ठजीने परमार्थके सुन्दर समयानुकूल वचन कहकर बहुत प्रकारसे भरतजीको उपदेश दिया॥४॥

**दो०** 
> तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।  
> उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु॥१६९॥

भावार्थ: [ वसिष्ठजीने कहा— ] हे तात! हृदयमें धीरज धरो और आज जिस कार्यके करनेका अवसर है, उसे करो। गुरुजीके वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करनेके लिये कहा॥१६९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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