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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 168"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 168

**चौ०** 
> बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं॥  
> कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी॥१॥

भावार्थ: जो लोग वेदोंको बेचते हैं, धर्मको दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरोंके पापोंको कह देते हैं; जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदोंकी निन्दा करनेवाले और विश्वभरके विरोधी हैं;॥१॥

**चौ०** 
> लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा॥  
> पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा॥२॥

भावार्थ: जो लोभी, लम्पट और लालचियोंका आचरण करनेवाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्रीकी ताकमें रहते हैं; हे जननी! यदि इस काममें मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गतिको पाऊँ॥२॥

**चौ०** 
> जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे॥  
> जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई॥३॥

भावार्थ: जिनका सत्सङ्गमें प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थके मार्गसे विमुख हैं; जो मनुष्यशरीर पाकर श्रीहरिका भजन नहीं करते; जिनको हरि-हर ( भगवान्‌ विष्णु और शंकरजी ) का सुयश नहीं सुहाता;॥३॥

**चौ०** 
> तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं॥  
> तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥४॥

भावार्थ: जो वेदमार्गको छोड़कर वाम ( वेदप्रतिकूल ) मार्गपर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत्‌को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेदको जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगोंकी गति दें॥४॥

**दो०** 
> मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।  
> कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ॥१६८॥

भावार्थ: माता कौसल्याजी भरतजीके स्वाभाविक ही सच्चे और सरल वचनोंको सुनकर कहने लगीं—हे तात! तुम तो मन, वचन और शरीरसे सदा ही श्रीरामचन्द्रके प्यारे हो॥१६८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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