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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 167"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 167

**चौ०** 
> बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई॥  
> भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए॥१॥

भावार्थ: भरत, शत्रुघ्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजीने उनको हृदयसे लगा लिया। अनेकों प्रकारसे भरतजीको समझाया और बहुत-सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनायीं॥१॥

**चौ०** 
> भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं॥  
> छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी॥२॥

भावार्थ: भरतजीने भी सब माताओंको पुराण और वेदोंकी सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले— ॥२॥

**चौ०** 
> जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें॥  
> जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें॥३॥

भावार्थ: जो पाप माता-पिता और पुत्रके मारनेसे होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणोंके नगर जलानेसे होते हैं; जो पाप स्त्री और बालककी हत्या करनेसे होते हैं और जो मित्र और राजाको जहर देनेसे होते हैं— ॥३॥

**चौ०** 
> जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं॥  
> ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता॥४॥

भावार्थ: कर्म, वचन और मनसे होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक ( बड़े-छोटे पाप ) हैं, जिनको कवि लोग कहते हैं; हे विधाता! यदि इस काममें मेरा मत हो, तो हे माता! वे सब पाप मुझे लगें॥४॥

**दो०** 
> जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।  
> तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर॥१६७॥

भावार्थ: जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजीके चरणोंको छोड़कर भयानक भूत-प्रेतोंको भजते हैं, हे माता! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे॥१६७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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