---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 166"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-166"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 166

**चौ०** 
> मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू॥  
> चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी॥१॥

भावार्थ: उनका मुख प्रसन्न था, मनमें न आसक्ति थी, न रोष ( द्वेष )। सबका सब तरहसे सन्तोष कराकर वे वनको चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीरामके चरणोंकी अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं॥१॥

**चौ०** 
> सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा॥  
> तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई॥२॥

भावार्थ: सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथने उन्हें रोकनेके बहुत यत्न किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मणको साथ लेकर चले गये॥२॥

**चौ०** 
> रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए॥  
> यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें॥३॥

भावार्थ: श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वनको चले गये। मैं न तो साथ ही गयी और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आँखोंके सामने हुआ। तो भी अभागे जीवने शरीर नहीं छोड़ा॥३॥

**चौ०** 
> मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी॥  
> जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना॥४॥

भावार्थ: अपने स्नेहकी ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम-सरीखे पुत्रकी मैं माता! जीना और मरना तो राजाने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रोंके समान कठोर है॥४॥

**दो०** 
> कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु।  
> ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु॥१६६॥

भावार्थ: कौसल्याजीके वचनोंको सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोकका निवास बन गया॥१६६॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-165  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-167

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
