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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 165"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 165

**चौ०** 
> सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए॥  
> भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई॥१॥

भावार्थ: सरल स्वभाववाली माताने बड़े प्रेमसे भरतजीको छातीसे लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मणजीके छोटे भाई शत्रुघ्नको हृदयसे लगाया। शोक और स्नेह हृदयमें समाता नहीं है॥१॥

**चौ०** 
> देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई॥  
> माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पोंछि मृदु बचन उचारे॥२॥

भावार्थ: कौसल्याजीका स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं—श्रीरामकी माताका ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माताने भरतजीको गोदमें बैठा लिया और उनके आँसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं—॥२॥

**चौ०** 
> अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥  
> जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानी॥३॥

भावार्थ: हे वत्स! मैं बलैया लेती हूँ। तुम अब भी धीरज धरो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्मकी गति अमिट जानकर हृदयमें हानि और ग्लानि मत मानो॥३॥

**चौ०** 
> काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता॥  
> जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा॥४॥

भावार्थ: हे तात! किसीको दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकारसे उलटा हो गया है, जो इतने दुःखपर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है?॥४॥

**दो०** 
> पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।  
> बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर॥१६५॥

भावार्थ: हे तात! पिताकी आज्ञासे श्रीरघुवीरने भूषण-वस्त्र त्याग दिये और वल्कल-वस्त्र पहन लिये। उनके हृदयमें न कुछ विषाद था, न हर्ष!॥१६५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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