---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 164"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-164"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 164

**चौ०** 
> भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई॥  
> देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी॥१॥

भावार्थ: भरतको देखते ही माता कौसल्याजी उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जानेसे मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीरकी सुध भुलाकर चरणोंमें गिर पड़े॥ १ ॥

**चौ०** 
> मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई॥  
> कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा॥२॥

भावार्थ: [ फिर बोले— ] माता! पिताजी कहाँ हैं ? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण कहाँ हैं ? [ उन्हें दिखा दे। ] कैकेयी जगत्‌में क्यों जनमी ? और यदि जनमी ही तो फिर बाँझ क्यों न हुई ?— ॥ २ ॥

**चौ०** 
> कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही॥  
> को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी॥३॥

भावार्थ: जिसने कुलके कलंक, अपयशके भाँड़े और प्रियजनोंके द्रोही मुझ-जैसे पुत्रको उत्पन्न किया। तीनों लोकोंमें मेरे समान अभागा कौन है ? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई!॥ ३ ॥

**चौ०** 
> पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतू॥  
> धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी॥४॥

भावार्थ: पिताजी स्वर्गमें हैं और श्रीरामजी वनमें हैं। केतुके समान केवल मैं ही इन सब अनर्थोंका कारण हूँ। मुझे धिक्कार है! मैं बाँसके वनमें आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दुःख और दोषोंका भागी बना॥४॥

**दो०** 
> मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि।  
> लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि॥१६४॥

भावार्थ: भरतजीके कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरतको उठाकर छातीसे लगा लिया और नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं॥१६४॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-163  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-165

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
