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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 16"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 16

**चौ०** 
> एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी॥  
> फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा॥१॥

भावार्थ: [ मन्थराने कहा— ] सारी आशाएँ तो एक ही बार कहनेमें पूरी हो गयीं। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूँगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने ही योग्य है, जो अच्छी बात कहनेपर भी आपको दुःख होता है॥ १ ॥

**चौ०** 
> कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई॥  
> हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती॥२॥

भावार्थ: जो झूठी-सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई! वे ही तुम्हें प्रिय हैं और मैं कड़वी लगती हूँ! अब मैं भी ठकुरसुहाती ( मुँहदेखी ) कहा करूँगी। नहीं तो दिन-रात चुप रहूँगी॥ २ ॥

**चौ०** 
> करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा॥  
> कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥३॥

भावार्थ: विधाताने कुरूप बनाकर मुझे परवश कर दिया! [ दूसरेको क्या दोष ] जो बोया सो काटती हूँ, दिया सो पाती हूँ। कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है ? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होऊँगी! ( अर्थात् रानी तो होनेसे रही )॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा॥  
> तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी॥४॥

भावार्थ: हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवि! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो॥ ४॥

**दो०** 
> गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।  
> सुरमाया बस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि॥१६॥

भावार्थ: आधाररहित ( अस्थिर ) बुद्धिकी स्त्री और देवताओंकी मायाके वशमें होनेके कारण रहस्ययुक्त कपटभरे प्रिय वचनोंको सुनकर रानी कैकेयीने वैरिन मन्थराको अपनी सुहृद् ( अहैतुक हित करनेवाली ) जानकर उसका विश्वास कर लिया॥ १६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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