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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 158"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 158

श्रीभरत-शत्रुघ्नका आगमन और शोक

**चौ०** 
> चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके॥  
> हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई॥१॥

भावार्थ: हवाके समान वेगवाले घोड़ोंको हाँकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलोंको लाँघते हुए चले। उनके हृदयमें बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। मनमें ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुँच जाऊँ॥१॥

**चौ०** 
> एक निमेष बरष सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई॥  
> असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा॥२॥

भावार्थ: एक-एक निमेष वर्षके समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगरके निकट पहुँचे। नगरमें प्रवेश करते समय अपशकुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरहसे काँव-काँव कर रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला॥  
> श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा॥३॥

भावार्थ: गदहे और सियार विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन-सुनकर भरतके मनमें बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है॥३॥

**चौ०** 
> खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए॥  
> नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सताये हुए पक्षी-पशु, घोड़े-हाथी [ ऐसे दुःखी हो रहे हैं कि ] देखे नहीं जाते। नगरके स्त्री-पुरुष अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी सम्पत्ति हार बैठे हों॥४॥

**दो०** 
> पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।  
> भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं॥१५८॥

भावार्थ: नगरके लोग मिलते हैं, पर कुछ कहते नहीं; गौंसे ( चुपकेसे ) जोहार ( वन्दना ) करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसीसे कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मनमें भय और विषाद छा रहा है॥१५८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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