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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 156"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 156

**चौ०** 
> जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा॥  
> जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा॥१॥

भावार्थ: जीने और मरनेका फल तो दशरथजीने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डोंमें छा गया। जीते-जी तो श्रीरामचन्द्रजीके चन्द्रमाके समान मुखको देखा और श्रीरामके विरहको निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया॥१॥

**चौ०** 
> सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥  
> करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहिं भूमितल बारहिं बारा॥२॥

भावार्थ: सब रानियाँ शोकके मारे व्याकुल होकर रो रही हैं। वे राजाके रूप, शील, बल और तेजका बखान कर-करके अनेकों प्रकारसे विलाप कर रही हैं और बार-बार धरतीपर गिर-गिर पड़ती हैं॥२॥

**चौ०** 
> बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी॥  
> अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू॥३॥

भावार्थ: दास-दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरनिवासी घर-घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्मकी सीमा, गुण और रूपके भण्डार सूर्यकुलके सूर्य अस्त हो गये!॥३॥

**चौ०** 
> गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं॥  
> एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी॥४॥

भावार्थ: सब कैकेयीको गालियाँ देते हैं, जिसने संसारभरको बिना नेत्रका ( अंधा ) कर दिया! इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रातःकाल सब बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि आये॥४॥

**दो०** 
> तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।  
> सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास॥१५६॥

भावार्थ: तब वसिष्ठ मुनिने समयके अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञानके प्रकाशसे सबका शोक दूर किया॥१५६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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