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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 155"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 155

मुनि वसिष्ठका भरतजीको बुलानेके लिये दूत भेजना

**चौ०** 
> धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू॥  
> कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही॥१॥

भावार्थ: धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले—सुमन्त्र! कहो, कृपालु श्रीराम कहाँ हैं? लक्ष्मण कहाँ हैं? स्नेही राम कहाँ हैं? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहाँ है?॥१॥

**चौ०** 
> बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती॥  
> तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई॥२॥

भावार्थ: राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकारसे विलाप कर रहे हैं। वह रात युगके समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजाको अंधे तपस्वी ( श्रवणकुमारके पिता ) के शापकी याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्याको कह सुनायी॥२॥

**चौ०** 
> भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा॥  
> सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा॥३॥

भावार्थ: उस इतिहासका वर्णन करते-करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीरामके बिना जीनेकी आशाको धिक्कार है। मैं उस शरीरको रखकर क्या करूँगा जिसने मेरा प्रेमका प्रण नहीं निबाहा?॥३॥

**चौ०** 
> हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते॥  
> हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर॥४॥

भावार्थ: हा रघुकुलको आनन्द देनेवाले मेरे प्राणप्यारे राम! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुवर! हा पिताके चित्तरूपी चातकके हित करनेवाले मेघ!॥४॥

**दो०** 
> राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।  
> तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम॥१५५॥

भावार्थ: राम-राम कहकर, फिर राम कहकर, फिर राम-राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीरामके विरहमें शरीर त्याग कर सुरलोकको सिधार गये॥१५५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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