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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 152"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 152

**चौ०** 
> पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी॥  
> सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी॥१॥

भावार्थ: हे तात! सब पुरवासियों और कुटुम्बियोंसे निहोरा ( अनुरोध ) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकारसे हितकारी है जिसकी चेष्टासे महाराज सुखी रहें॥१॥

**चौ०** 
> कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ॥  
> पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी॥२॥

भावार्थ: भरतके आनेपर उनको मेरा सँदेसा कहना कि राजाका पद पा जानेपर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मनसे प्रजाका पालन करना और सब माताओंको समान जानकर उनकी सेवा करना॥२॥

**चौ०** 
> ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई॥  
> तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ॥३॥

भावार्थ: और हे भाई! पिता, माता और स्वजनोंकी सेवा करके भाईपनेको अन्ततक निबाहना। हे तात! राजा ( पिताजी ) को उसी प्रकारसे रखना जिससे वे कभी ( किसी तरह भी ) मेरा सोच न करें॥३॥

**चौ०** 
> लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा॥  
> बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई॥४॥

भावार्थ: लक्ष्मणजीने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजीने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार-बार अपनी सौगंध दिलायी [ और कहा— ] हे तात! लक्ष्मणका लड़कपन वहाँ न कहना॥४॥

**दो०** 
> कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।  
> थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह॥१५२॥

भावार्थ: प्रणामकर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, परन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं। उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रोंमें जल भर आया और शरीर रोमाञ्चसे व्याप्त हो गया॥१५२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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