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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 151"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 151

**चौ०** 
> केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई॥  
> होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा॥१॥

भावार्थ: केवट ( निषादराज ) ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर ( शृंगवेरपुर ) में ही बितायी। दूसरे दिन सबेरा होते ही बड़का दूध मँगवाया और उससे श्रीराम-लक्ष्मणने अपने सिरोंपर जटाओंके मुकुट बनाये॥१॥

**चौ०** 
> राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई॥  
> लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई॥२॥

भावार्थ: तब श्रीरामचन्द्रजीके सखा निषादराजने नाव मँगवायी। पहले प्रिया सीताजीको उसपर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजीने धनुष-बाण सजाकर रखे और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े॥२॥

**चौ०** 
> बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा॥  
> तात प्रनामु तात सन कहेहू। बार बार पद पंकज गहेहू॥३॥

भावार्थ: मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले—हे तात! पिताजीसे मेरा प्रणाम कहना और मेरी ओरसे बार-बार उनके चरणकमल पकड़ना॥३॥

**चौ०** 
> करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी॥  
> बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें॥४॥

भावार्थ: फिर पाँव पकड़कर विनती करना कि हे पिताजी! आप मेरी चिन्ता न कीजिये। आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्यसे वनमें और मार्गमें हमारा कुशल-मङ्गल होगा॥४॥

**छं०** 
> तुम्हरें अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं।  
> प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं॥  
> जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी।  
> तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी॥

भावार्थ: हे पिताजी! आपके अनुग्रहसे मैं वन जाते हुए सब प्रकारका सुख पाऊँगा। आज्ञाका भलीभाँति पालन करके चरणोंका दर्शन करने कुशलपूर्वक फिर लौट आऊँगा। सब माताओंके पैरों पड़-पड़कर उनका समाधान करके और उनसे बहुत विनती करके—तुलसीदास कहते हैं—तुम वही प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी कुशल रहें।

**सो०** 
> गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि।  
> करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति॥१५१॥

भावार्थ: बार-बार चरणकमलोंको पकड़कर गुरु वसिष्ठजीसे मेरा सँदेसा कहना कि वे वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें॥१५१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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