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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 15"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 15

**चौ०** 
> प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही॥  
> सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥१॥

भावार्थ: [ और फिर बोलीं— ] हे प्रिय वचन कहनेवाली मन्थरा! मैंने तुझको यह सीख दी है ( शिक्षाके लिये इतनी बात कही है )। मुझे तुझपर स्वप्नमें भी क्रोध नहीं है। सुन्दर मङ्गलदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा ( अर्थात् श्रीरामका राज्यतिलक होगा )॥ १ ॥

**चौ०** 
> जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई॥  
> राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली॥२॥

भावार्थ: बड़ा भाई स्वामी और छोटा भाई सेवक होता है। यह सूर्यवंशकी सुहावनी रीति ही है। यदि सचमुच कल ही श्रीरामका तिलक है, तो हे सखी! तेरे मनको अच्छी लगे वही वस्तु माँग ले, मैं दूँगी॥ २ ॥

**चौ०** 
> कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी॥  
> मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी॥३॥

भावार्थ: रामको सहज स्वभावसे सब माताएँ कौसल्याके समान ही प्यारी हैं। मुझपर तो वे विशेष प्रेम करते हैं। मैंने उनकी प्रीतिकी परीक्षा करके देख ली है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू॥  
> प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें॥४॥

भावार्थ: जो विधाता कृपा करके जन्म दें तो [ यह भी दें कि ] श्रीरामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों। श्रीराम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। उनके तिलकसे ( उनके तिलककी बात सुनकर ) तुझे क्षोभ कैसा ?॥ ४॥

**दो०** 
> भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।  
> हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ॥१५॥

भावार्थ: तुझे भरतकी सौगन्ध है, छल-कपट छोड़कर सच-सच कह। तू हर्षके समय विषाद कर रही है, मुझे इसका कारण सुना॥ १५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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