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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 147"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 147

दशरथ-सुमन्त्र-संवाद, दशरथ-मरण

**चौ०** 
> एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा॥  
> बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा॥१॥

भावार्थ: सुमन्त्र इस प्रकार मार्गमें पछतावा कर रहे थे, इतनेमें ही रथ तुरंत तमसा नदीके तटपर आ पहुँचा। मन्त्रीने विनय करके चारों निषादोंको विदा किया। वे विषादसे व्याकुल होते हुए सुमन्त्रके पैरों पड़कर लौटे॥ १ ॥

**चौ०** 
> पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई॥  
> बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा॥२॥

भावार्थ: नगरमें प्रवेश करते मन्त्री [ ग्लानिके कारण ] ऐसे सकुचाते हैं, मानो गुरु, ब्राह्मण या गौको मारकर आये हों। सारा दिन एक पेड़के नीचे बैठकर बिताया। जब सन्ध्या हुई तब मौका मिला॥ २ ॥

**चौ०** 
> अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें॥  
> जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए॥३॥

भावार्थ: अँधेरा होनेपर उन्होंने अयोध्यामें प्रवेश किया और रथको दरवाजेपर खड़ा करके वे [ चुपके-से ] महलमें घुसे। जिन-जिन लोगोंने यह समाचार सुन पाया, वे सभी रथ देखनेको राजद्वारपर आये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे॥  
> नगर नारि नर ब्याकुल कैसें। निघटत नीर मीनगन जैसें॥४॥

भावार्थ: रथको पहचानकर और घोड़ोंको व्याकुल देखकर उनके शरीर ऐसे गले जा रहे हैं ( क्षीण हो रहे हैं ) जैसे घाममें ओले! नगरके स्त्री-पुरुष कैसे व्याकुल हैं जैसे जलके घटनेपर मछलियाँ [ व्याकुल होती हैं ]॥ ४॥

**दो०** 
> सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।  
> भवनु भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु॥१४७॥

भावार्थ: मन्त्रीका [ अकेले ही ] आना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो गया। राजमहल उनको ऐसा भयानक लगा मानो प्रेतोंका निवासस्थान ( श्मशान ) हो॥ १४७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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