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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 144"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 144

**चौ०** 
> गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई॥  
> चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा॥१॥

भावार्थ: निषादराज गुह सारथी ( सुमन्त्रजी )-को पहुँचाकर ( विदा करके ) लौटा। उसके विरह और दुःखका वर्णन नहीं किया जा सकता। वे चारों निषाद रथ लेकर अवधको चले। [ सुमन्त्र और घोड़ोंको देख-देखकर ] वे भी क्षण-क्षणभर विषादमें डूबे जाते थे॥१॥

**चौ०** 
> सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना॥  
> रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू॥२॥

भावार्थ: व्याकुल और दुःखसे दीन हुए सुमन्त्रजी सोचते हैं कि श्रीरघुवीरके बिना जीनेको धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है ही नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजीके बिछुड़ते ही छूटकर इसने यश [ क्यों ] नहीं ले लिया॥२॥

**चौ०** 
> भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना॥  
> अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका॥३॥

भावार्थ: ये प्राण अपयश और पापके भाँड़े हो गये। अब ये किस कारण कूच नहीं करते ( निकलते नहीं ) ? हाय! नीच मन [ बड़ा अच्छा ] मौका चूक गया। अब भी तो हृदयके दो टुकड़े नहीं हो जाते!॥३॥

**चौ०** 
> मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहुँ कृपन धन रासि गवाँई॥  
> बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई॥४॥

भावार्थ: सुमन्त्र हाथ मल-मलकर और सिर पीट-पीटकर पछताते हैं। मानो कोई कंजूस धनका खजाना खो बैठा हो। वे इस प्रकार चले मानो कोई बड़ा योद्धा वीरका बाना पहनकर और उत्तम शूरवीर कहलाकर युद्धसे भाग चला हो!॥४॥

**दो०** 
> बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।  
> जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति॥१४४॥

भावार्थ: जैसे कोई विवेकशील, वेदका ज्ञाता, साधुसम्मत आचरणोंवाला और उत्तम जातिका ( कुलीन ) ब्राह्मण धोखेसे मदिरा पी ले और पीछे पछतावे, उसी प्रकार मन्त्री सुमन्त्र सोच कर रहे ( पछता रहे ) हैं॥ १४४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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