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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 142"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 142

सुमन्त्रका अयोध्याको लौटना और सर्वत्र शोक देखना

**चौ०** 
> जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें॥  
> सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि॥१॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजीकी कैसी सँभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रोंके गोलकोंकी। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजीकी [ अथवा लक्ष्मणजी और सीताजी श्रीरामचन्द्रजीकी ] ऐसी सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य शरीरकी करते हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी॥  
> कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा॥२॥

भावार्थ: पक्षी, पशु, देवता और तपस्वियोंके हितकारी प्रभु इस प्रकार सुखपूर्वक वनमें निवास कर रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं—मैंने श्रीरामचन्द्रजीका सुन्दर वनगमन कहा। अब जिस तरह सुमन्त्र अयोध्यामें आये वह [ कथा ] सुनो॥ २ ॥

**चौ०** 
> फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई॥  
> मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू॥३॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको पहुँचाकर जब निषादराज लौटा, तब आकर उसने रथको मन्त्री ( सुमन्त्र )- सहित देखा। मन्त्रीको व्याकुल देखकर निषादको जैसा दुःख हुआ, वह कहा नहीं जाता॥ ३ ॥

**चौ०** 
> राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी॥  
> देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥४॥

भावार्थ: [ निषादको अकेले आया देखकर ] सुमन्त्र हा राम! हा राम! हा सीते! हा लक्ष्मण! पुकारते हुए, बहुत व्याकुल होकर धरतीपर गिर पड़े। [ रथके ] घोड़े दक्षिण दिशाकी ओर [ जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे ] देख-देखकर हिनहिनाते हैं। मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हों॥४॥

**दो०** 
> नहिं तृन चरहिं न पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।  
> ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि॥१४२॥

भावार्थ: वे न तो घास चरते हैं, न पानी पीते हैं। केवल आँखोंसे जल बहा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजीके घोड़ोंको इस दशामें देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये॥१४२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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