---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 14"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-14"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 14

**चौ०** 
> कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई॥  
> रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू॥१॥

भावार्थ: [ वह कहने लगी— ] हे माई! हमें कोई क्यों सीख देगा और मैं किसका बल पाकर गाल करूँगी ( बढ़-बढ़कर बोलूँगी )। रामचन्द्रको छोड़कर आज और किसकी कुशल है, जिन्हें राजा युवराज-पद दे रहे हैं॥१॥

**चौ०** 
> भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन॥  
> देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा॥२॥

भावार्थ: आज कौसल्याको विधाता बहुत ही दाहिने ( अनुकूल ) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदयमें गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मनमें क्षोभ हुआ है॥२॥

**चौ०** 
> पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें॥  
> नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई॥३॥

भावार्थ: तुम्हारा पुत्र परदेशमें है, तुम्हें कुछ सोच नहीं। जानती हो कि स्वामी हमारे वशमें है। तुम्हें तो तोशक-पलँगपर पड़े-पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजाकी कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखतीं॥३॥

**चौ०** 
> सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी॥  
> पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी॥४॥

भावार्थ: मन्थराके प्रिय वचन सुनकर किन्तु उसको मनकी मैली जानकर रानी झुककर ( डाँटकर ) बोली—बस, अब चुप रह घरफोड़ी कहींकी! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा लूँगी॥ ४॥

**दो०** 
> काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।  
> तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि॥१४॥

भावार्थ: कानों, लँगड़ों और कुबड़ोंको कुटिल और कुचाली जानना चाहिये। उनमें भी स्त्री और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजीकी माता कैकेयी मुसकरा दीं॥ १४॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-13  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-15

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
