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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 139"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 139

**चौ०** 
> नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी॥  
> परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी॥१॥

भावार्थ: आँखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजीको देखकर जन्मका फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं, और अचर ( पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि ) भगवान्‌की चरण-रजका स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यों सभी परमपद ( मोक्ष ) के अधिकारी हो गये॥१॥

**चौ०** 
> सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन॥  
> महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू॥२॥

भावार्थ: वह वन और पर्वत स्वाभाविक ही सुन्दर, मङ्गलमय और अत्यन्त पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाला है। उसकी महिमा किस प्रकार कही जाय, जहाँ सुखके समुद्र श्रीरामजीने निवास किया है॥२॥

**चौ०** 
> पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई॥  
> कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन॥३॥

भावार्थ: क्षीरसागरको त्यागकर और अयोध्याको छोड़कर जहाँ सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी आकर रहे, उस वनकी जैसी परम शोभा है, उसको हजार मुखवाले जो लाख शेषजी हों तो वे भी नहीं कह सकते॥३॥

**चौ०** 
> सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं॥  
> सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी॥४॥

भावार्थ: उसे भला, मैं किस प्रकारसे वर्णन करके कह सकता हूँ। कहीं पोखरेका [ क्षुद्र ] कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है ? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्मसे श्रीरामचन्द्रजीकी सेवा करते हैं। उनके शील और स्नेहका वर्णन नहीं किया जा सकता॥४॥

**दो०** 
> छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।  
> करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु॥१३९॥

भावार्थ: क्षण-क्षणपर श्रीसीतारामजीके चरणोंको देखकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मणजी स्वप्नमें भी भाइयों, माता-पिता और घरकी याद नहीं करते॥१३९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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