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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 137"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 137

**चौ०** 
> रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥  
> राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे॥१॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीको केवल प्रेम प्यारा है; जो जाननेवाला हो ( जानना चाहता हो ), वह जान ले। तब श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमसे परिपुष्ट हुए ( प्रेमपूर्ण ) कोमल वचन कहकर उन सब वनमें विचरण करनेवाले लोगोंको संतुष्ट किया॥ १ ॥

**चौ०** 
> बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए॥  
> एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई॥२॥

भावार्थ: फिर उनको विदा किया। वे सिर नवाकर चले और प्रभुके गुण कहते-सुनते घर आये। इस प्रकार देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले दोनों भाई सीताजीसमेत वनमें निवास करने लगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> जब तें आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु॥  
> फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना। मंजु बलित बर बेलि बिताना॥३॥

भावार्थ: जबसे श्रीरघुनाथजी वनमें आकर रहे तबसे वन मङ्गलदायक हो गया। अनेकों प्रकारके वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलोंके मण्डप तने हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए॥  
> गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी॥४॥

भावार्थ: वे कल्पवृक्षके समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं। मानो वे देवताओंके वन ( नन्दनवन ) को छोड़कर आये हों। भौंरोंकी पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है॥ ४ ॥

**दो०** 
> नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।  
> भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर॥१३७॥

भावार्थ: नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर आदि पक्षी कानोंको सुख देनेवाली और चित्तको चुरानेवाली तरह-तरहकी बोलियाँ बोलते हैं॥ १३७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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