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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 136"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 136

**चौ०** 
> धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा॥  
> धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी॥१॥

भावार्थ: हे नाथ! जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वनमें विचरनेवाले पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफलजन्म हो गये॥ १ ॥

**चौ०** 
> हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा॥  
> कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी॥२॥

भावार्थ: हम सब भी अपने परिवारसहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया। आपने बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है। यहाँ सभी ऋतुओंमें आप सुखी रहियेगा॥ २ ॥

**चौ०** 
> हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई॥  
> बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा॥३॥

भावार्थ: हमलोग सब प्रकारसे हाथी, सिंह, सर्प और बाघोंसे बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभो! यहाँके बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ और खोह ( दर्रे ) सब पग-पग हमारे देखे हुए हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब॥  
> हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता॥४॥

भावार्थ: हम वहाँ-वहाँ ( उन-उन स्थानोंमें ) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि जलाशयोंको दिखावेंगे। हम कुटुम्बसमेत आपके सेवक हैं। हे नाथ! इसलिये हमें आज्ञा देनेमें संकोच न कीजियेगा॥ ४ ॥

**दो०** 
> बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।  
> बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन॥१३६॥

भावार्थ: जो वेदोंके वचन और मुनियोंके मनको भी अगम हैं, वे करुणाके धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलोंके वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकोंके वचन सुनता है॥ १३६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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