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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 134"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 134

**चौ०** 
> अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला॥  
> राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू॥१॥

भावार्थ: उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूटमें आये और श्रीरामचन्द्रजीने सब किसीको प्रणाम किया। देवता नेत्रोंका लाभ पाकर आनन्दित हुए॥ १ ॥

**चौ०** 
> बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू॥  
> करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए॥२॥

भावार्थ: फूलोंकी वर्षा करके देवसमाजने कहा—हे नाथ! आज [ आपका दर्शन पाकर ] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [ दुःखोंके नाशका आश्वासन पाकर ] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ २ ॥

**चौ०** 
> चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए॥  
> आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा॥३॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजी चित्रकूटमें आ बसे हैं, यह समाचार सुन-सुनकर बहुत-से मुनि आये। रघुकुलके चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजीने मुदित हुई मुनिमण्डलीको आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं॥  
> सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं॥४॥

भावार्थ: मुनिगण श्रीरामजीको हृदयसे लगा लेते हैं और सफल होनेके लिये आशीर्वाद देते हैं। वे सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजीकी छबि देखते हैं और अपने सारे साधनोंको सफल हुआ समझते हैं॥ ४॥

**दो०** 
> जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।  
> करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद॥१३४॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य सम्मान करके मुनिमण्डलीको विदा किया। [ श्रीरामचन्द्रजीके आ जानेसे ] वे सब अपने-अपने आश्रमोंमें अब स्वतन्त्रताके साथ योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे॥ १३४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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