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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 131"
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lang: "hi"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 131

**चौ०** 
> अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं॥  
> नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका॥१॥

भावार्थ: जो अवगुणोंको छोड़कर सबके गुणोंको ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौके लिये संकट सहते हैं, नीति-निपुणतामें जिनकी जगत्‌में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर है॥ १ ॥

**चौ०** 
> गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा॥  
> राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही॥२॥

भावार्थ: जो गुणोंको आपका और दोषोंको अपना समझता है, जिसे सब प्रकारसे आपका ही भरोसा है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदयमें आप सीतासहित निवास कीजिये॥ २ ॥

**चौ०** 
> जाति पाँति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥  
> सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई॥३॥

भावार्थ: जाति, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर—सबको छोड़कर जो केवल आपको ही हृदयमें धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी! आप उसके हृदयमें रहिये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना॥  
> करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा॥४॥

भावार्थ: स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टिमें समान हैं, क्योंकि वह जहाँ-तहाँ ( सब जगह ) केवल धनुष-बाण धारण किये आपको ही देखता है; और जो कर्मसे, वचनसे और मनसे आपका दास है, हे रामजी! आप उसके हृदयमें डेरा कीजिये॥ ४ ॥

**दो०** 
> जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।  
> बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु॥१३१॥

भावार्थ: जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिये और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मनमें निरन्तर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है॥ १३१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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