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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 13"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 13

**चौ०** 
> दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा॥  
> पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू॥१॥

भावार्थ: मन्थराने देखा कि नगर सजाया हुआ है। सुन्दर मङ्गलमय बधावे बज रहे हैं। उसने लोगोंसे पूछा कि कैसा उत्सव है ? [ उनसे ] श्रीरामचन्द्रजीके राजतिलककी बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा॥१॥

**चौ०** 
> करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती॥  
> देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती॥२॥

भावार्थ: वह दुर्बुद्धि नीच जातिवाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकारसे यह काम रात-ही-रातमें बिगड़ जाय, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहदका छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरहसे उखाड़ लूँ॥२॥

**चौ०** 
> भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥  
> ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू॥ ३॥

भावार्थ: वह उदास होकर भरतजीकी माता कैकेयीके पास गयी। रानी कैकेयीने हँसकर कहा—तू उदास क्यों है ? मन्थरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी साँस ले रही है और त्रियाचरित्र करके आँसू ढरका रही है॥३॥

**चौ०** 
> हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें॥  
> तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि॥४॥

भावार्थ: रानी हँसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं ( तू बहुत बढ़-बढ़कर बोलनेवाली है )। मेरा मन कहता है कि लक्ष्मणने तुझे कुछ सीख दी है ( दण्ड दिया है )। तब भी वह महापापिनी दासी कुछ भी नहीं बोलती। ऐसी लंबी साँस छोड़ रही है, मानो काली नागिन [ फुफकार छोड़ रही ] हो॥४॥

**दो०** 
> सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।  
> लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु॥१३॥

भावार्थ: तब रानीने डरकर कहा—अरी! कहती क्यों नहीं ? श्रीरामचन्द्र, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कुशलसे तो हैं ? यह सुनकर कुबरी मन्थराके हृदयमें बड़ी ही पीड़ा हुई॥१३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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