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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 127"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 127

**चौ०** 
> जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे॥  
> तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा॥१॥

भावार्थ: हे राम! जगत्‌ दृश्य है, आप उसके देखनेवाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शङ्करको भी नचानेवाले हैं। जब वे भी आपके मर्मको नहीं जानते, तब और कौन आपको जाननेवाला है?॥ १ ॥

**चौ०** 
> सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥  
> तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन॥२॥

भावार्थ: वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनन्दन! हे भक्तोंके हृदयके शीतल करनेवाले चन्दन! आपकी ही कृपासे भक्त आपको जान पाते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी॥  
> नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा॥३॥

भावार्थ: आपकी देह चिदानन्दमय है ( यह प्रकृतिजन्य पञ्चमहाभूतोंकी बनी हुई कर्मबन्धनयुक्त, त्रिदेह-विशिष्ट मायिक नहीं है ) और [ उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि ] सब विकारोंसे रहित है; इस रहस्यको अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतोंके कार्यके लिये [ दिव्य ] नर-शरीर धारण किया है और प्राकृत ( प्रकृतिके तत्त्वोंसे निर्मित देहवाले, साधारण ) राजाओंकी तरहसे कहते और करते हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥  
> तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा॥४॥

भावार्थ: हे राम! आपके चरित्रोंको देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोहको प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य ( उचित ) ही है; क्योंकि जैसा स्वाँग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिये ( इस समय आप मनुष्यरूपमें हैं, अतः मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है )॥ ४ ॥

**दो०** 
> पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।  
> जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ॥१२७॥

भावार्थ: आपने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ रहूँ? परन्तु मैं यह पूछते सकुचाता हूँ कि जहाँ आप न हों, वह स्थान बता दीजिये तब मैं आपके रहनेके लिये स्थान दिखाऊँ॥ १२७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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