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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 126"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 126

**चौ०** 
> देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे॥  
> अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई॥१॥

भावार्थ: हे मुनिराज! आपके चरणोंका दर्शन करनेसे आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये ( हमें सारे पुण्योंका फल मिल गया )। अब जहाँ आपकी आज्ञा हो और जहाँ कोई भी मुनि उद्वेगको प्राप्त न हो—॥ १ ॥

**चौ०** 
> मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं॥  
> मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू॥२॥

भावार्थ: क्योंकि जिनसे मुनि और तपस्वी दुःख पाते हैं, वे राजा बिना अग्निके ही ( अपने दुष्ट कर्मोंसे ही ) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणोंका संतोष सब मङ्गलोंकी जड़ है और भूदेव ब्राह्मणोंका क्रोध करोड़ों कुलोंको भस्म कर देता है॥ २॥

**चौ०** 
> अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ॥  
> तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौं कछु काल कृपाला॥३॥

भावार्थ: ऐसा हृदयमें समझकर—वह स्थान बतलाइये जहाँ मैं लक्ष्मण और सीतासहित जाऊँ। और वहाँ सुन्दर पत्तों और घासकी कुटी बनाकर, हे दयालु! कुछ समय निवास करूँ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी॥  
> कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू॥४॥

भावार्थ: श्रीरामजीकी सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले—धन्य! धन्य! हे रघुकुलके ध्वजास्वरूप! आप ऐसा क्यों न कहेंगे ? आप सदैव वेदकी मर्यादाका पालन ( रक्षण ) करते हैं॥ ४॥

**छं०** 
> श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी।  
> जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाइ कृपानिधान की॥  
> जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी।  
> सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी॥

भावार्थ: हे राम! आप वेदकी मर्यादाके रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकीजी [ आपकी स्वरूपभूता ] माया हैं, जो कृपाके भण्डार आपकी रुख पाकर जगत्‌का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार मस्तकवाले सर्पोंके स्वामी और पृथ्वीको अपने सिरपर धारण करनेवाले हैं, वही चराचरके स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं। देवताओंके कार्यके लिये आप राजाका शरीर धारण करके दुष्ट राक्षसोंकी सेनाका नाश करनेके लिये चले हैं।

**सो०** 
> राम सरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर।  
> अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह॥१२६॥

भावार्थ: हे राम! आपका स्वरूप वाणीके अगोचर, बुद्धिसे परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद निरन्तर उसका ‘नेति-नेति’ कहकर वर्णन करते हैं॥ १२६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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