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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 122"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 122

**चौ०** 
> गावँ गावँ अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू॥  
> जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं॥१॥

भावार्थ: सूर्यकुलरूपी कुमुदिनीके प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमास्वरूप श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनकर गाँव-गाँवमें ऐसा ही आनन्द हो रहा है। जो लोग [ वनवास दिये जानेका ] कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राजा-रानी [ दशरथ-कैकेयी ] को दोष लगाते हैं॥१॥

**चौ०** 
> कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू॥  
> कहहिं परसपर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं॥२॥

भावार्थ: कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रोंका लाभ दिया। स्त्री-पुरुष सभी आपसमें सीधी, स्नेहभरी सुन्दर बातें कह रहे हैं॥२॥

**चौ०** 
> ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए॥  
> धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ॥३॥

भावार्थ: [ कहते हैं— ] वे माता-पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। वह नगर धन्य है जहाँसे ये आये हैं। वह देश, पर्वत, वन और गाँव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहाँ-जहाँ ये जाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही॥  
> राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई॥४॥

भावार्थ: ब्रह्माने उसीको रचकर सुख पाया है जिसके ये ( श्रीरामचन्द्रजी ) सब प्रकारसे स्नेही हैं। पथिकरूप श्रीराम-लक्ष्मणकी सुन्दर कथा सारे रास्ते और जंगलमें छा गयी है॥४॥

**दो०** 
> एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।  
> जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत॥१२२॥

भावार्थ: रघुकुलरूपी कमलके खिलानेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्गके लोगोंको सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मणजीसहित वनको देखते हुए चले जा रहे हैं॥१२२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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