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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 117"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 117

**चौ०** 
> कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे॥  
> सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी॥१॥

भावार्थ: हे सुमुखि! कहो तो अपनी सुन्दरतासे करोड़ों कामदेवोंको लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं? उनकी ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गयीं और मन-ही-मन मुसकरायीं॥१॥

**चौ०** 
> तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचति बरबरनी॥  
> सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी॥२॥

भावार्थ: उत्तम ( गौर ) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर [ संकोचवश ] पृथ्वीकी ओर देखती हैं। वे दोनों ओरके संकोचसे सकुचा रही हैं ( अर्थात्‌ न बतानेमें ग्रामकी स्त्रियोंको दुःख होनेका संकोच है और बतानेमें लज्जारूप संकोच )। हिरणके बच्चेके सदृश नेत्रवाली और कोकिलकी-सी वाणीवाली सीताजी सकुचाकर प्रेमसहित मधुर वचन बोलीं—॥२॥

**चौ०** 
> सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे॥  
> बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी॥३॥

भावार्थ: ये जो सहजस्वभाव, सुन्दर और गोरे शरीरके हैं,उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजीने [ लज्जावश ] अपने चन्द्रमुखको आँचलसे ढककर और प्रियतम ( श्रीरामजी ) की ओर निहारकर भौंहें टेढ़ी करके,॥३॥

**चौ०** 
> खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि॥  
> भईं मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं॥४॥

भावार्थ: खंजन पक्षीके-से सुन्दर नेत्रोंको तिरछा करके सीताजीने इशारेसे उन्हें कहा कि ये ( श्रीरामचन्द्रजी ) मेरे पति हैं। यह जानकर गाँवकी सब युवती स्त्रियाँ इस प्रकार आनन्दित हुईं मानो कंगालोंने धनकी राशियाँ लूट ली हों॥४॥

**दो०** 
> अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।  
> सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस॥११७॥

भावार्थ: वे अत्यन्त प्रेमसे सीताजीके पैरों पड़कर बहुत प्रकारसे आशिष देती हैं ( शुभ कामना करती हैं ) कि जबतक शेषजीके सिरपर पृथ्वी रहे, तबतक तुम सदा सुहागिनी बनी रहो,॥११७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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