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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 116"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 116

**चौ०** 
> बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी॥  
> राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई॥१॥

भावार्थ: उस मनोहर जोड़ीका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजीकी सुन्दरताको सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनोंको लगाकर देख रहे हैं॥१॥

**चौ०** 
> थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से॥  
> सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं॥२॥

भावार्थ: प्रेमके प्यासे [ वे गाँवोंके ] स्त्री-पुरुष [ इनके सौन्दर्य-माधुर्यकी छटा देखकर ] ऐसे थकित रह गये जैसे दीपकको देखकर हिरनी और हिरन [ निस्तब्ध रह जाते हैं ]! गाँवोंकी स्त्रियाँ सीताजीके पास जाती हैं; परन्तु अत्यन्त स्नेहके कारण पूछते सकुचाती हैं॥२॥

**चौ०** 
> बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ॥  
> राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं॥३॥

भावार्थ: बार-बार सब उनके पाँव लगतीं और सहज ही सीधे-सादे कोमल वचन कहती हैं—हे राजकुमारी! हम विनती करती ( कुछ निवेदन करना चाहती ) हैं, परन्तु स्त्री-स्वभावके कारण कुछ पूछते हुए डरती हैं॥३॥

**चौ०** 
> स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी॥  
> राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने॥४॥

भावार्थ: हे स्वामिनि! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गँवारी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभावसे ही लावण्यमय ( परम सुन्दर ) हैं। मरकतमणि ( पन्ने ) और सुवर्णने कान्ति इन्हींसे पायी है ( अर्थात्‌ मरकतमणिमें और स्वर्णमें जो हरित और स्वर्णवर्णकी आभा है वह इनकी हरिताभनील और स्वर्णकान्तिके एक कणके बराबर भी नहीं है )॥४॥

**दो०** 
> स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।  
> सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन॥११६॥

भावार्थ: श्याम और गौर वर्ण है, सुन्दर किशोर अवस्था है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभाके धाम हैं। शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान इनके मुख और शरद्‌-ऋतुके कमलके समान इनके नेत्र हैं॥११६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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