---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 115"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-115"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 115

**चौ०** 
> एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी॥  
> सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी॥१॥

भावार्थ: कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल वाणीसे कहते हैं—नाथ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यन्त प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजीने— ॥ १ ॥

**चौ०** 
> जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं॥  
> मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा॥२॥

भावार्थ: मनमें सीताजीको थकी हुई जानकर घड़ीभर बड़की छायामें विश्राम किया। स्त्री-पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूपने उनके नेत्र और मनोंको लुभा लिया है॥२॥

**चौ०** 
> एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा॥  
> तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा॥३॥

भावार्थ: सब लोग टकटकी लगाये श्रीरामचन्द्रजीके मुखचन्द्रको चकोरकी तरह ( तन्मय होकर ) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजीका नवीन तमाल वृक्षके रंगका ( श्याम ) शरीर अत्यन्त शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेवोंके मन मोहित हो जाते हैं॥३॥

**चौ०** 
> दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के॥  
> मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलनि धनु तीरा॥४॥

भावार्थ: बिजलीके-से रंगके लक्ष्मणजी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नखसे शिखातक सुन्दर हैं, और मनको बहुत भाते हैं। दोनों मुनियोंके ( वल्कल आदि ) वस्त्र पहने हैं और कमरमें तरकस कसे हुए हैं। कमलके समान हाथोंमें धनुष-बाण शोभित हो रहे हैं॥४॥

**दो०** 
> जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।  
> सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल॥११५॥

भावार्थ: उनके सिरोंपर सुन्दर जटाओंके मुकुट हैं; वक्षःस्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखोंपर पसीनेकी बूँदोंका समूह शोभित हो रहा है॥११५॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-114  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-116

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
