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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 11"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 11

**चौ०** 
> बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना॥  
> भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं॥१॥

भावार्थ: बहुत प्रकारके बाजे बज रहे हैं। नगरके अतिशय आनन्दका वर्णन नहीं हो सकता। सब लोग भरतजीका आगमन मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और [ राज्याभिषेकका उत्सव देखकर ] नेत्रोंका फल प्राप्त करें॥१॥

**चौ०** 
> हाट बाट घर गलीं अथाईं। कहहिं परसपर लोग लोगाईं॥  
> कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा॥२॥

भावार्थ: बाजार, रास्ते, घर, गली और चबूतरोंपर ( जहाँ-तहाँ ) पुरुष और स्त्री आपसमें यही कहते हैं कि कल वह शुभ लग्न ( मुहूर्त्त ) कितने समय है जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे॥२॥

**चौ०** 
> कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता॥  
> सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली॥३॥

भावार्थ: जब सीताजीसहित श्रीरामचन्द्रजी सुवर्णके सिंहासनपर विराजेंगे और हमारा मनचीता होगा ( मनःकामना पूरी होगी )। इधर तो सब यह कह रहे हैं कि कल कब होगा, उधर कुचक्री देवता विघ्न मना रहे हैं॥३॥

**चौ०** 
> तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा॥  
> सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं॥४॥

भावार्थ: उन्हें ( देवताओंको ) अवधके बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोरको चाँदनी रात नहीं भाती। सरस्वतीजीको बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार-बार उनके पैरोंको पकड़कर उनपर गिरते हैं॥४॥

**दो०** 
> बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।  
> रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु॥११॥

भावार्थ: [ वे कहते हैं— ] हे माता! हमारी बड़ी विपत्तिको देखकर आज वही कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी राज्य त्यागकर वनको चले जायँ और देवताओंका सब कार्य सिद्ध हो॥११॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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