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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 109"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 109

तापस-प्रकरण

**चौ०** 
> राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं॥  
> मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं॥१॥

भावार्थ: [ चलते समय ] बड़े प्रेमसे श्रीरामजीने मुनिसे कहा— हे नाथ! बताइये हम किस मार्गसे जायँ। मुनि मनमें हँसकर श्रीरामजीसे कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए॥  
> सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहिं मगु दीख हमारा॥२॥

भावार्थ: फिर उनके साथके लिये मुनिने शिष्योंको बुलाया। [ साथ जानेकी बात ] सुनते ही चित्तमें हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गये। सभीका श्रीरामजीपर अपार प्रेम है। सभी कहते हैं कि मार्ग हमारा देखा हुआ है॥ २ ॥

**चौ०** 
> मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे॥  
> करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई॥३॥

भावार्थ: तब मुनिने [ चुनकर ] चार ब्रह्मचारियोंको साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मोंतक सब सुकृत ( पुण्य ) किये थे। श्रीरघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषिकी आज्ञा पाकर हृदयमें बड़े ही आनन्दित होकर चले॥ ३ ॥

**चौ०** 
> ग्राम निकट जब निकसहिं जाई। देखहिं दरसु नारि नर धाई॥  
> होहिं सनाथ जनम फलु पाई। फिरहिं दुखित मनु संग पठाई॥४॥

भावार्थ: जब वे किसी गाँवके पास होकर निकलते हैं तब स्त्री-पुरुष दौड़कर उनके रूपको देखने लगते हैं। जन्मका फल पाकर वे [ सदाके अनाथ ] सनाथ हो जाते हैं और मनको नाथके साथ भेजकर [ शरीरसे साथ न रहनेके कारण ] दुःखी होकर लौट आते हैं॥ ४ ॥

**दो०** 
> बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।  
> उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम॥१०९॥

भावार्थ: तदनन्तर श्रीरामजीने विनती करके चारों ब्रह्मचारियोंको विदा किया; वे मनचाही वस्तु ( अनन्य भक्ति ) पाकर लौटे। यमुनाजीके पार उतरकर सबने यमुनाजीके जलमें स्नान किया, जो श्रीरामचन्द्रजीके शरीरके समान ही श्याम रंगका था॥ १०९ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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